The City of Tehzeeb , Lucknow आने के लिए दिल्ली से आपको ट्रैन ,बस ,flight सभी चीज़ें आसानी से मिल जाती है इसके अलावा देश के विभिन्न शहरों से भी सभी चीज़ें उपलब्ध हैं आप यहाँ आराम से आ सकते हैं  स्टेशन पहुँचने के बाद यहाँ से आपको टेक्सी या अन्य वाहन आसानी से मिल जायेंगे ये स्टेशन  चारबाग में स्थित होने के कारण इसे चारबाग स्टेशन भी कहते हैं। ये चारबाग़ रेलवे स्टेशन मुगलों के style में बना हुआ है, अपने आप में बहुत हीं अनोखा है। अगर आप यहाँ होटल लेना चाहें तो बहुत ज्यादा महंगे hotels नहीं होंगे सब आपके बजट में हीं रहेगा यहाँ 250rs से room start होते हैं जो 10 ,000rs तक जायेंगे ये सब Depend करता है आपको किस तरह का room चाहिए। आपको किसी भी तरह की परेशानी नहीं आएँगी घूमने में , वो कहते हैं ना “मुस्कराइए, आप लखनऊ में हैं”। ये Slogan यूँ हीं famous नहीं हुआ। लखनऊ ,नवाबों का शहर ……………..जो ना सिर्फ तमीज़ और तेहज़ीब के लिए  जाना जाता है लेकिन यहाँ  के  मशहूर ज़ायके और ऐतिहासिक जगहें यहाँ आये लोगों का मन हीं नहीं बल्कि दिल भी खुश कर देता है , तो चलिए शुरुआत करते हैं Uttar Pradesh की Capital Lucknow से tour2go के साथ।

बड़ा इमामबाड़ा( Bara Imambara )

मैं लखनऊ की शुरुआत बड़ा इमामबाड़ा से करने जा रही हूँ

Uttar Pradesh Capital  Lucknow The City of Tehzeeb

1774 में बना बड़ा इमामबाड़ा एक सबसे मशहूर स्मारकों में शामिल है अवध के चौथे नवाब  आसिफ उद्दौला ने इसे एक ऐसे अंदाज़ में बनवाया कि अंदर समाया 50meter लम्बा और 15meter की ऊंचाई वाले धनुष के आकर का हॉल दुनिया के सबसे बड़े धनुषाकार हॉल में शामिल हो गया। ऐतिहासिक स्मारकों ,किलों का दीदार करते हुए  सामान्यतः ख्याल में यही आता है कि अपने ऐशो आराम के लिए शायद बनवाया होगा लेकिन बड़ा इमामबाड़ा इंसानियत की मिशाल   कायम करता है। यहाँ की बात करें तो यहाँ की ईंटों में कुछ अलग हीं  बात है ईंटों की दास्ताँ उस हकीकत को बयां करती है जिसे जानने के बाद आप भी कहेंगे नवाबी शहर की खासियत कुछ और है आइये बताते हैं कि आखिर इसे क्यों बनवाया गया था। जब भी इस इमारत को आप अपने आँखों में कैद करे तो ये जरूर याद रखें कि इसे बनाने के पीछे का मकसद 1784 के आकाल में उन पीड़ितों को रहत पहुँचाना था जिनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था ,उन्हीं कि मदद के लिए ये कायम हुआ। ईंटों कि गज़ब
Interlocking ,कंक्रीटों का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं है और किसी भी सहारे के बिना छत का ऐसी तरह बरक़रार रहना बड़ा इमामबाड़ा की सबसे बड़ी पहचान है।

भूल भुल्लैया ( Bhool Bhulaiyaa )

Uttar Pradesh Capital  Lucknow The City of Tehzeeb

इसके अंदर एक भूल भुल्लैया भी है। इसमें करीब 1000 से ज्यादा गलियारे हैं जो आपको भ्रम की दुनिया में ले जाते हैं । मै गाइड के साथ  गयी थी और आपको भी सलाह देना चाउंगी कि  आप भी अकेले बिलकुल भी न जाए  जब भी जाएँ  गाइड के साथ ही जाएँ, उनसे झूठी- सच्ची कहानिया भी सुनने को मिलेंगी. यहाँ एक और मजेदार उदाहरण देखने को मिलेगी।   बचपन से हम सुनते आये हैं कि  ” दीवारों के भी कान होते है ” यहाँ आ कर इसको महसूस भी किया जा सकता है  exp – बड़े इमामबाड़े के अंदर का   के  हिस्से में जहाँ माचिस की तिल्ली के जलने की आवाज भी एक कोने से दुसरे कोने में सुनाई देती है ,फुसफुसाकर बोलने से भी आवाज़ एक कोने से दूसरे कोने पर आराम से सुनाई देती है।

दीवारों को देखने पर अंदाजा होता है की पर्यटन विभाग भूलभुलैया को भूल गया है , कई जगह चूना निकल  रहा है, पत्थर उखड रहे है  और जहाँ दीवार जर्जर नहीं थोड़ी सही हालत में है वहां कुछ आशिको ने  लिख रखी है.  कुल मिला कर 1024 में से कुछ दरवाजे जर्जर होके बंद हो चुके है और धीरे धीरे बाकी का हिस्सा भी उसी कगार पर है।भूल भुल्लैया का निर्माण बड़े इमामबाड़े के बनाने  के  Time पर Architects   के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी , क्यूंकि नवाब साहब इमामबाड़े के Main  कक्ष को बड़ा ( 170 x 55 फीट ) बनवाना चाहते थे।  जिसमे कोई भी Pillar  न हों  के ताकि उसमे ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा  लोग  एकसाथ     प्रार्थना कर सके. अब चुनौती ये थी के बिना स्तम्भ के भारी भरकम छत्त और गुम्बद का वजन ये इमारत कैसे झेल पाएगी ? कई हफ्तों तक विचार करने के बाद फैसला लिया गया के छत्त को खोखला बनाया जाएगा जिस से छत्त का आधा वजन कम हो जाएगा जो की इमारत की दीवारे  बिना सहारे के झेल लेंगी। तब जाकर छत्त पर सैंकड़ो दरवाजे बनाये गये जो आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए है और इसे भूलभुलैया कहा गया।

Clock Tower

Clock Tower

ये बड़ा इमामबाड़ा के सामने है और रूमी दरवाज़े के थोड़ी हीं दूरी  पर है। हुसैनाबाद घंटाघर कि ऊंचाई 67 मीटर या 221 फीट है। इस घंटाघर को  1887 में बनवाया  गया था । इस घंटा घर को रास्‍केल पायने ने  Design किया था। यह Clock tower भारत में Victorian – Gothic Style के  Architecture का नायाब उदाहरण है। इसके बनने  की शुरूआत नवाब नसीर-उद-दीन ने अवध के पहले संयुक्‍त प्रांत के लेफ्टिनेंट गर्वनर जॉर्ज काउपर के स्‍वागत में करवाया था। हांलांकि इस काम को बिच में हीं 1887 में  रोकना पड़ा जब उनकी मृत्यु हो गयी।  उस वक्त इस टॉवर को बनाने में  1.74 लाख की लागत लगी थी। घंटाघर कि सुईयां भी नवाबी हीं थी इसे लंदन के लुईगेट हिल से  लायी गयी बन्दुक धातु से बनाया गया ये 14 फिट लम्बा और डेढ़ इंच मोटाई लिए Pendulum को देखकर ऐसा लगता है मनो वक्त का पहिया कभी न थमने की  सीख   दे रहा हो ।

रूमी दरवाज़ा (Rumi Darwaza )

Uttar Pradesh Capital  Lucknow The City of Tehzeeb

ये दरवाज़ा 1784 में नवाब आसफ़  उद दौला  ने  अकाल के दौरान बड़ा इमामबाड़ा के साथ इसलिए बनवाया था  ताकि बेसहारा और बेबस जिंदगियों को रोज़गार नसीब हो सकें। 60  फ़िट रूमी दरवाज़ा उन ऐतिहासिक उन ऐतिहासिक इमारतों में शुमार है जो अवध वास्तुकला की बेहद खूबसूरत मिसाल हैं यहाँ से गुज़रकर कभी देखिएगा यकीनन खुद के लखनऊ में होने पर नाज़ होगा । इसकी बनावट तुर्की के सुल्तान के दरबार के प्रवेशद्वार से काफी मिलती जुलती है  इसलिए  रूमी दरवाज़े को तुर्कीस दरवाज़े के नाम से भी जाना जाता है जो 13वी शताब्दी के महान  सूफी फ़क़ीर जलालुद्दीन मुहम्मद रूमी के नाम पर पड़ा था। इसके ऊपरी भाग में छतरी नुमा आकृति है जो बहुत हीं खूबसूरत प्रतीत होती हैं नीचे  से देखने पर। इस द्वार को लखनऊ शहर के प्रवेशद्वार के रूप में भी जाना जाता है ये रूमी दरवाज़ा लखनऊ का Signature building भी है ये अपनी खूबसूरती और बनावट के लिए काफी मशहूर है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *