Akshardham Temple भारत में दो Different places गुजरात और Delhi में बना हुआ हैं । मैं  आज Delhi में स्थित Akshardham Temple के बारे में पूरी जानकारी दूंगी । Akshardham Temple 100 एकड़ Land  पर बने Akshardham Temple  को Swaminarayan Akshardham Temple  भी कहा जाता है।

दुनिया के सबसे विशाल हिंदू Temple के तौर पर उसका नाम The Guinness Book of Records  में भी दर्ज  है। Swaminarayan Akshardham Temple का निर्माण कार्य “BAPS : – बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (The Bochasanwasi Shri Akshar Purushottam Swaminarayan Sanstha – BAPS)” के आशीर्वाद से और 11,000 कारीगरों और हज़ारों   BAPS स्वयंसेवकों के विराट धार्मिक प्रयासों से केवल पांच वर्ष में पूरा हुआ। इस मन्दिर का उद्घाटन 6 नवम्बर, 2005 में हुआ और 8 नवम्बर, 2005 को इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया ।

 Akshardham Temple

Swaminarayan Akshardham Temple  में आप अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते, न फ़ोन, न कैमरा कुछ भी नहीं। इसलिए आप अगर यहाँ पर जाएँ तो, अपने expensive  सामान लेकर न जाएँ। Temple Complex में Photo लेने की अनुमति भी नहीं है।

Exhibitions

Ticket Price  :- इन Exhibitions के लिए टिकट की कीमत adults के लिए प्रति व्यक्ति रु 170 है जबकि 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों के लिए यह प्रति व्यक्ति रु 125 है । 4 -11 वर्ष आयु वर्ग के children के लिए, टिकट की कीमत प्रति व्यक्ति 100 रुपये है। प्रवेश 4 वर्ष से कम उम्र के children के लिए free है ।

Sahajanand Darshan – Hall Of Values (50 मिनट)

अहिंसा, ईमानदारी और आध्यात्मिकता का उल्लेख करने वाली movies और Robotic show  के माध्यम से चिरस्थायी मानव values  का अनुभव।

Neelkanth Darshan – Giant Screen Film (40 मिनट)

नीलकण्ठ नामक एक 11साल के  योगी की अविश्वसनीय कहानी के माध्यम से भारत की जानकारी ले सकते हैं

Sanskruti Darshan – Cultural Boat Ride (15 मिनट)

भारत की शानदार विरासत के 10,000 वर्षों का सफ़र कराती है। भारत के ऋषियों-वैज्ञानिकों की खोजों और आविष्कारों की जानकारी ले सकते हैं , एलौरा की गुफाओं से होकर जाएं और प्राचीन काल से ही मानवता के प्रति भारत के योगदान की जानकारी ले सकते हैं ।

Musical fountain show (15 मिनट)

Temple Complex  में पर्यटकों के लिए attraction का केंद्र है, यहाँ शाम के समय  आयोजित   किया जाने वाला Musical fountain show , हर शाम 15 मिनट के इस Musical fountain show  में पूरे  जीवन चक्र को दर्शाया जाता है। जीवन चक्र के इस  show को, जन्म से मृत्यु तक के चक्र को बहुत ही ख़ूबसूरत रंग बिरंगे Lights से fountain के साथ दिखाया जाता है। Ticket Price  :- Musical fountain show के लिए टिकट की कीमत adults के लिए प्रति व्यक्ति 80rs है जबकि 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों , 4 -11 वर्ष आयु वर्ग के children के लिए, टिकट की कीमत प्रति व्यक्ति 50rs है। प्रवेश 4 वर्ष से कम उम्र के children के लिए free है ।

Swaminarayan /Neelkanth Story

भारत समयातीत परम्पराओं की धरती है जहाँ भक्ति और रोज़ाना ज़िंदगी एक दूसरे में घुल मिल गए हैं । ये महान योगियों की धरती है जिन्होंने सांसारिक संबंधों से मुक्त होकर अकेले वीरान यात्राएं की है । अपने अस्तित्व को गहराई से समझने के लिए वो घर ,परिवार सुख सुविधाओं को त्याग कर निकल पड़ते हैं और प्रकृति की कठोरताओं को सहजता से झेलते हैं योग और अनुशासन द्वारा वे अद्भुत और शारीरिक तथा मानसिक सिद्धियां प्राप्त कर लेते हैं । दूसरों को अपना ज्ञान बाँटने के लिए वे निकल पड़ते हैं ,तब सहस ,त्याग और विवेक की अनेकों महान गाथाओं का जन्म होता है ये गाथा है एक ऐसे बालक की जिसने आध्यात्मिक भारत के रहस्यों को उद्घाटित करते हुए एक आसाधारण यात्रा की । उनका नाम था नीलकंठ । वे थे तो केवल 11 वर्ष के ,मगर उन्होंने वेद ,उपनिषद आदि शास्त्रों पर प्रभुत्व पा लिया था । एक रात नीलकंठ ने एक असाधारण संकल्प किया ,सभी जानते थे की एक din नीलकंठ साडी सांसारिक सुख सुविधाएँ छोड़ देंगे और एक योगी का कठिन और चुनौतीपूर्ण जीवन अपना लेंगे मगर ये नहीं जानते थे कि ये कब और क्यों । वो 29 जून 1792 कि रात थी जब नीलकंठ अकेले ,पैदल चल पड़े । कौन जानता था कि एक बालक कि यात्रा असंख्य लोगों के जीवन में परिवर्तन लाएगी । नीलकंठ ने वो सब पीछे छोड़ दिया जो उनके लिए जाना पहचाना था ।कोई पीछा न करे इसलिए उसने एक अकल्पनीय रास्ता अपनाया उन्होंने बाढ़ सी उफनती सरयू नदी में प्रवेश किया इस बात से अनजान कि वो कौन से तट पर पहुंचाएगा या फिर तट पर पहुंचेंगे भी या नहीं । नदी से जीवित निकलने पर नीलकंठ का संकल्प और दृढ हो गया । उन्होंने 7 वर्षों तक 12000 km की यात्रा पूरे भारत का किया । भारत के एक कोने से दूर कोने की यात्रा में नीलकंठ पृथ्वी पर बसी लगभग हर तरह की बस्तियों में से गुज़रे । उत्तर में वे पृथ्वी की सबसे ऊँची श्रृंखला  हिमालय पर जा चढ़े । इन  खतरनाक बर्फीले पर्वतों में शून्य से नीचे  तापमान का बालयोगी नीलकंठ ने सामना किया । एक तरफ 50 डिग्री तापमान पर सुलगते और पानी की बून्द को तरसते रेगिस्तान ,तो दूसरी तरफ चेरापूंजी जैसे घने जंगल जहाँ दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश होती है ।यहाँ से गुज़रते नीलकंठ दुनिया के सबसे बड़े  प्रायद्वीप के साथ साथ चले जो 4000 मील से भी ज्यादा है ।इस विशाल भूमि को उन्होंने देखा । नीलकंठ की सहिसियिक यात्रा उन्हें सभ्यता के प्राचीन पालने  से से होते हुए ले गयी जहाँ 8000 वर्षों से भी पहले मानव बस्तियों का उदय हो चूका था हाल के खोज संकेत देते हैं की मिस्र और मिसोपोटामिया से सहस्राब्दियों पहले भारत में एक महान संस्कृति पनपी थी ।  अपने आध्यात्मिक मूल्यों को दूसरों के साथ बाँटने के लिए नीलकंठ उत्तर पश्चिम की ओर निकले उस क्षेत्र की ओर जहाँ भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा का जन्म हुआ है । वे जहाँ भी गए काम उम्र के इस बालक को देखकर लोग आश्चयचकित रह जाते थे । नीलकंठ से प्रभावित होकर कुछ लोगों ने पास के तीर्थ हरिद्वार आने की विनती की । हरिद्वार में हज़ारों वर्षों से हर शाम गंगा की आरती की जाती है जब आरती में नीलकंठ को मुख्य पुजारी ने देखा तो बिच में ही आरती छोड़कर नीलकंठ से मिले बिना न रह सके । नीलकंठ चाहे कहीं भी हों अपनी परम्पराओं का आदर करते हुए प्रभात की पहली किरणों के संग नित्य पूजा आराधना करते थे । भारत धार्मिक संस्कारों की धरती है ,जन्म से मृत्यु तक जीवन के हर अवसर पर भारतीय लोग धार्मिक विधियां करते हैं । वो मृत्यु ही थी जिसका सामना नीलकंठ ने तब किया जब वे हिमालय में श्रीपुर पहुंचे । बालक को देखकर महंतजी ने नीलकंठ को चेतावनी दी कि यहाँ एक मानवभक्षी शेर ने सबको आतंकित कर रखा है, इसलिए बालयोगी को मंदिर में हीं रहना चाहिए । वो मंदिर में न रूक कर पेड़ के नीचे हीं ध्यान करने लगे ऐसा लग रहा था कि अब मौत निश्चित है । ” भय नहीं सिर्फ प्रेम हीं नीलकंठ का एक मात्र प्रतिभाव ” था ।उनके आध्यात्मिक प्रकाश ने हिंसक सिंह को अहिंसक बना दिया ।सुबह होते हीं शेर जंगल लौट चला और गांव में शांति लौट आई । ग्रामवासियों  ने नीलकंठ को ग्राम में हीं रहने का आग्रह किया ,नीलकंठ ने समझाया कि ” रोज़ाना ज़िंदगी के छोटे मोठे डर हों या मौत का डर उससे मुक्त होने के लिए आत्म शक्ति की ज़रूरत है । नीलकंठ जहाँ भी गए लोगो ने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया ।नवम्बर 1792 में नीलकंठ हिमालय में बदरीनाथ पहुंचे तब शीतकाल शुरू हो गया था ।पूरा बद्रीनाथ बर्फ से ढंकने वाला था पूरा गांव नीचे गर्म स्थानों की ओर उतरने की तयारी कर रहा था । बालयोगी को मंदिर के पुजारी ने अपने साथ चलने के लिए विनती की लेकिन नीलकंठ का लक्ष्य हिमालय में योग साधना और दयँ करना था । पुजारी ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि ” पृथ्वी पर कोई भी स्थान मानव जीवन के लिए इतना कठिन नहीं जितना दिसंबर में हिमालय ” बालयोगी के जीवन के लिए चिंतित पुजारी ने पूछा कि इतनी कठिन यात्रा वे किसलिए कर रहे हैं । उन्होंने हंसकर जवाब  दिया ” मेरी यात्रा कल्याण के लिए है । ” और नीलकठ ने अकेले हीं पृथ्वी कि सबसे घातक मौसम और कठोरतम जगह में प्रवेश किया शून्य के नीचे जब 40 डिग्री तापमान पर जब 100 km /hr कि रफ़्तार से जब कातिल हवाएं हुंकार रही हों तब 20 min भी खुले में रहना  मौत को निमंत्रण देने के बराबर है परन्तु  नीलकंठ नंगे पाव ,खुले शरीर कैसे जीवित बच गए ये आज तक एक रहस्य हीं बना हुआ है ।भयानक बर्फीली  घाटियों को पार करके नीलकंठ ने पवित्र शिखर कैलाश के दर्शन किये ।वे मानसरोवर के किनारे पहुंचे ये पृथ्वी कि सबसे ऊँची झीलों में से एक है और भारत की चार महान नदियों का श्रोत । नेपाल के अनपूर्णा क्षेत्र में नीलकंठ पृथ्वी की सबसे गहरी घाटी   से गुज़रे 22000 फिट से ज्यादा गहरी ये घाटी है । पर्वतों की ऊंचाइयों में नीलकंठ मुक्तिनाथ पहुंचे यहाँ भगवन विष्णु का एक अति प्राचीन मंदिर है इसके चारो ओर भगवान के 108 नाम के प्रतीक स्वरुप 108 पवित्र जल धाराएं बह रही है । यहाँ नीलकंठ ने अपने जीवन की कठिनतम तपश्या प्रारम्भ की और समय के साथ ऐसी आध्यात्मिक साधनायें उनके जीवन का प्रमुख अंग बन गया  । हिमालय में 4 वर्ष बिताने के बाद नीलकंठ पूर्व भारत की ओर चल पड़े ।उनके वचनों को सुनने शहर में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी ।धर्मस्थानो में जाकर नीलकंठ लोगों को अंध विश्वास और अंध श्रद्धा से मुक्त करके उनमे सच्ची भगवत श्रद्धा सुदृढ़ करते थे । भारत मंदिरों गिरजाघरों,मस्जिदों आदि  का एक पुष्प गुच्छ है युगों से कला की विभिन्न परम्पराएं यहाँ फली फूली सुंदरता की ऐसी पच्चीकारी जो शायद और कहीं नहीं देखीं   जा सकती है । इन मंदिरों और स्मारकों के उपरांत नीलकंठ पूर्व भारत के भयानक बरसाती जंगलो से भी गुज़रे । वे बंगाल के सूंदर वन से चलते रहे ,घर छोड़ने  के लगभग   5 साल  बाद  नीलकंठ पूर्वी भारत में जगरनाथ पूरी पहुंचे यहाँ के राजा मुकुंददेव ,नीलकंठ से मिले और उन्हें रथ यात्रा में आने का निमंत्रण दिया । भारत में लावण्यमय मुद्राये , भव्य उत्सव या मंदिर के भव्य प्रवेशद्वार सबकुछ भक्ति के हीं विभिन्न स्वरूप हैं । दक्षिण में नीलकंठ रामेस्वरम के प्रसिद्ध मंदिर पहुंचे । भारत यात्रा करते करते नीलकंठ ने देखा कि लोग भेद भावो के कारण पीड़ित हैं ।उन्होंने भेदभावों को छोड़कर एक दूसरे के साथ मिलजुलकर रहने के लिए लोगों को प्रेरित किया । अगले दो वर्षों तक नीलकंठ भारत के दक्ष्णि छोड़ पर यात्रा करते रहे ।  अपनी पूरी यात्रा के दौरान नीलकंठ न केवल अपने पूरे देश को देखा बल्कि अपने देशवासियों कि सेवा करने का एक भी अवसर जाने न दिया । गृहत्याग के 7 वर्ष बाद नीलकंठ पश्चिम भारत में गुजरात के लोज़ गांव पहुंचे इस लोज़ गांव कि तरह आज भी भारत की 80 प्रतिशत आबादी ऐसे शांतिमय भक्तिमय गांव  में बसती है । गांववालों ने देखा की इस बाल बरमचारी की ज्ञान दृस्टि उनके 18 वर्षों की अपेक्षा कहीं ज्यादा है उन्होंने इनसे प्रसिद्ध संत रामानंद के आश्रम में पधारने की विनती की । जब  स्वामी रामनन्द , नीलकंठ से मिले तो रामानंद जी को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे यही वो नीलकंठ है जिनकी वे बरसों से प्रतीक्षा कर रहे थे । उन्होंने नीलकंठ से धर्मधर्य स्वीकार करने को कहा नीलकंठ को ये स्वीकार न था । वे चाहते थे पर्वतों की नीरवता प्रकृति की स्वतंत्रता लेकिन स्वामी रामानंद जी ने उन्हें समाज में हीं रहने का आग्रह किया ताकि समाज का कल्याण हो सके आखिर लोक कल्याण के लिए ये नीलकंठ ने स्वीकार कर लिया । इस तरह से उनके 7 सालों की यात्रा अब समाप्त होने वाली थी । नीलकंठ भगवान स्वामीनारायण के नाम से लोगों के दिलों में विराजमान हो गए वे इतिहास के सबसे अंधकार काल में आशा की एक किरण बनकर आये हिंसा ,अन्धविश्वास ,और भेदभावों के बादलों को दूर कटे हुए उन्होंने शांति ,समानता और एकता का वातावरण बनाने के लिए  निरंतर कार्य किया ।भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ भौतिक जगत से परे जीवन के गूढ़ रहस्यों की खोज निरंतर चलती रहती है जहाँ समर्पित योगी अध्यात्म इस साहसिक यात्रा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । ताकि जीवन के महत्वपूर्ण सत्य उजागर हो सके ।

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