भारत की सबसे प्राचीन नगरी , जो भगवान शिव को है सबसे प्यारी जहाँ नज़र आती है सनातन धर्म (हिन्दू धर्म )की गहराई और होती है मोक्ष की प्राप्ति मैं बात कर रही हूँ भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी आध्यात्मिक नगरी कशी की , जो दो नदियों ( वरुणा +असी ) के बीच कशी के बसने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा। इसे बनारस भी कहते हैं।

Varanasi
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किसी ने बहुत  हीं खूबसूरत तरीके से बनारस को इस कविता में बयां किया है मैं इसी कविता से शुरुआत करना चाहूंगी।

कोई नहीं समझ पाया है, महिमा अपरम्पार बनारस।
भले क्षीर सागर हों विष्णु, शिव का तो दरबार बनारस।।
हर-हर महादेव कह करती, दुनिया जय-जयकार बनारस।
माता पार्वती संग बसता, पूरा शिव परिवार बनारस।।
कोतवाल भैरव करते हैं, दुष्टों का संहार बनारस।
माँ अन्नपूर्णा घर भरती हैं, जिनका है भण्डार बनारस।।
महिमा ऋषि देव सब गाते, मगर न पाते पार बनारस।
कण-कण शंकर घर-घर मंदिर, करते देव विहार बनारस।।
वरुणा और अस्सी के भीतर, है अनुपम विस्तार बनारस।
जिसकी गली-गली में बसता, है सारा संसार बनारस।।
एक बार जो आ बस जाता, कहता इसे हमार बनारस।
विविध धर्म और भाषा-भाषी, रहते ज्यों परिवार बनारस।।
वेद शास्त्र उपनिषद ग्रन्थ जो, विद्या के आगार बनारस।
यहाँ ज्ञान गंगा संस्कृति की, सतत् प्रवाहित धार बनारस।।
वेद पाठ मंत्रों के सस्वर, छूते मन के तार बनारस।
गुरु गोविन्द बुद्ध तीर्थंकर, सबके दिल का प्यार बनारस।।
कला-संस्कृति, काव्य-साधना, साहित्यिक संसार बनारस।
शहनाई गूँजती यहाँ से, तबला ढोल सितार बनारस।।
जादू है संगीत नृत्य में, जिसका है आधार बनारस।
भंगी यहाँ ज्ञान देता है, ज्ञानी जाता हार बनारस।।
ज्ञान और विज्ञान की चर्चा, निसदिन का व्यापार बनारस।
ज्ञानी गुनी और नेमी का, नित करता सत्कार बनारस।।
मरना यहाँ सुमंगल होता और मृत्यु श्रृंगार बनारस।
काशी वास के आगे सारी, दौलत है बेकार बनारस।।
एक लंगोटी पर देता है, रेशम को भी वार बनारस।
सुबहे-बनारस दर्शन करने, आता है संसार बनारस।।
रात्रि चाँदनी में गंगा जल, शोभा छवि का सार बनारस।
होती भव्य राम लीला है, रामनगर दरबार बनारस।।
सारनाथ ने दिया ज्ञान का, गौतम को उपहार बनारस।
भारत माता मंदिर बैठी, करती नेह-दुलार बनारस।।
नाग-नथैया और नक्कटैया, लक्खी मेले चार बनारस।
मालवीय की अमर कीर्ति पर, जग जाता, बलिहार बनारस।।
पाँच विश्वविद्यालय करते, शिक्षा का संचार बनारस।
गंगा पार से जाकर देखो, लगता धनुषाकार बनारस।।
राँड़-साँड़, सीढ़ी, संन्यासी, घाट हैं चन्द्राकार बनारस।
पंडा-गुन्डा और मुछमुन्डा, सबकी है भरमार बनारस।।
कहीं पुजैय्या कहीं बधावा, उत्सव सदाबहार बनारस।
गंगा जी में चढ़े धूम से, आर-पार का हार बनारस।।
फगुआ, तीज, दशहरा, होली, रोज़-रोज़ त्योहार बनारस।
कुश्ती, दंगल, बुढ़वा मंगल, लगै ठहाका यार बनारस।।
बोली ऐसी बनारसी है, बरबस टपके प्यार बनारस।
और पान मघई का अब तक, जोड़ नहीं संसार बनारस।।
भाँति-भाँति के इत्र गमकते, चौचक खुश्बूदार बनारस।
छनै जलेबी और कचौड़ी, गरमा-गरम आहार बनारस।।
छान के बूटी लगा लंगोटी, जाते हैं उस पार बनारस।
हर काशी वासी रखता है, ढेंगे पर संसार बनारस।।
सबही गुरु इहाँ है मालिक, ई राजा रंगदार बनारस।
चना-चबेना सबको देता, स्वयं यहाँ करतार बनारस।।
यहाँ बैठ कर मुक्ति बाँटता, जग का पालनहार बनारस।
धर्म, अर्थ और काम, मोक्ष का, इस वसुधा पर द्वार बनारस।।
मौज और मस्ती की धरती, सृष्टि का उपहार बनारस।
अनुपम सदा बहार बनारस, धरती का श्रृंगार बनारस।।

वैसे तो हर जगह की सुबह अपना एक अलग अंदाज़ लेकर आती है पर बनारस में दो सुबहें होती हैं एक जो आकाश में होती होती है और दूसरी ह्रदय में इसलिए यहाँ सिर्फ सूर्योदय हीं  नहीं बल्कि बोधोदय भी होता है इस बोधोदय को एक नया आयाम देती है उत्तरवाहिनी गंगा उसकी  बहने  के गवाह ये प्राचीन घाट और घाटों के किनारे बसा  पक्का घर उसमे रहने वालों के जीने का अलग अंदाज़ जिसके हर जर्रे  या कण कण में बसती है हमारी संस्कृति और हमारे संस्कार ।

India's Ancient city Kashi called Varanasi or Banaras
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इसी तरह  तुलसी दास ने बनारस के विषय में बहुत खूब लिखा है :-

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न॥

( जहाँ श्री शिव-पार्वती बसते हैं, उस काशी को मुक्ति की जन्मभूमि, ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया जाए?)

 बनारस अपने आप में दुनिया की एक ऐसी जगह है जहाँ की सुबह का असर भौतिक , मानसिक और अध्यत्मित  इन  तीनो स्तरों पर महसूस किया जा सकता है। ऐसा लगता है जैसे हर साँस के साथ एक आध्यत्मित ऊर्जा शरीर में प्रवेश कर रही हों। ऐसी ऊर्जा से परिपूर्ण सीढ़ियों से उतरते शरणार्थी, घाटों पर टहलते वैरागी ,तट पर लगा पर्यटकों का मेला रिवायतों से सजी सुबह की वेला,दूर मस्जिद से आती सहर की अजान और सदियों से सुलगता एक महा शमशान ये सब बहुत है हमें खुद को भुलाने के लिए और सबकुछ भूलकर खुद को पाने के लिए।

India's Ancient city Kashi called Varanasi or Banaras
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Uttar Pradesh के बनारस में लोग सुख की आशा नही बल्कि शांति की उम्मीद ले कर आते हैं वो असीम शांति जो सुबह की देवी हर रोज़ यहाँ बांटती है इस अमृत पान के लिए लोग ततपर रहते हैं और इस देवी को अपनी कला और साधना अर्पित करते हैं कोई खुद को सजा कर ,कोई अपने स्थान को सजा कर, कोई ज़ोर आज़मा कर,कोई अपने सुरीले स्वरों से फ़िज़ाओं को जगाकर ,जिधर भी नज़र जाती है बनारस अपनी मौज़ में डूबा नज़र आता है। बनारस में वैद्यता का ये आलम है की यहाँ की भक्ति भी कई भागों में होती है कभी सखा भाव ,कभी दास भाव तो कभी वात्सल्य भाव जैसी जिसकी प्रकृति वैसी उसकी भक्ति।

Varanasi Famous Food

बनारसी शौक़ीन होते हैं स्नान ध्यान के बाद उन्हें बढ़िया नाश्ता चाहिए। ऐसी शौक के लोग जब विभिन्न प्रांतों से जब बनारस में आये तो यहाँ नाश्ते की एक विशिष्ट परंपरा उत्पन्न हुई जिसमे – कचौड़ी जलेबी और सर्दियों में मलइयो (malaiyo )ठिठुराती ठंड में गुनगुनाती धूप सा एहसास देती है बनारस की मलइयो। मुंह में जाते ही घुल जाती है और तासीर ऐसी जो देर तक जुबान पर मिठास बनाए रखती है। काशी खानपान के लिए भी प्रसिद्ध है  इसकी भी अपनी वजह है। क्योंकि, ये खास मलइयो ओस की बूंदों से बनता है। जैसे जैसे ठंड बढ़ती है, इसकी खासियत भी बढ़ने लगती है।

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बनारसी पान

बनारस में ऐसा माना जाता है कि पान जीवन का punctuation है जैसे हर एक क्रिया के बाद full stop या खड़ी पाई है उसी तरह एक भोजन की क्रिया समाप्त होने पर full stop या खड़ी पाई पान है।

देश से लेकर विदेश तक बनारसी पान मशहूर है. जो बनारस आता है बिना बनारसी पान खाए वापस नहीं जाता है. इसकी Popularity का अंदाजा इस बाद से लगाया जा सकता है. कि इसको लेकर बॉलीवुड फिल्मों में गाने तक बनाए जा चुके है, जैसे खई के पान बनारस वाला, खुल जाये बंद अकल का ताला. बनारस के ऐसा शहर है जहां रोजाना लाखों टूरिस्ट यहां आते है और बनारसी रंग में रंग जाते है।यहां पर आपको थोड़ी-थोड़ी दूर पर कोई न कोई पण भंडार मिल ही जाएगा. बनारस के पान की सबसे बड़ी खास बात यह है कि इसकी मिठास के आगे रसगुल्ले तक फेल है. जब इतनी बात बनारसी पान की हो रही है तो चलिए आज हम आपको बनारस की कुछ ऐसे मशहूर पान भंडारों के बारे में बताएंगे जिनकी दुकानों का पान चखने के लिए बॉलीवुड सितारे तक उनकी दूकान आये है।

Banarasi paan

बनारस के मशहूर लौंगलता और लस्सी

लगभग बनारस की हर दूसरी दुकान पर आपको मिल जाएगा ‘लौंग लता’, इसे ‘लवंग लतिका’ भी कहते हैं। जब भी बनारसी व्यंजनों की बात होती है, तो लौंग लता का नाम जरूर आता है। जो भी काशी आता है, वो एक बार तो जरूर इसको चखता है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित है बनारसी लस्सी की मशहूर दुकान ब्लू लस्सी। ये दुकान करीब 95 साल पुरानी है। भोलेनाथ के गानों की धुन और ठंडी-ठंडी लस्सी का मजा ही कुछ और होता है। यहां हर वक्त देसी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। यहां पर आपको हर फ्लेवर की लस्सी मिलेगी- अनार, सेब, चॉकलेट आदि। यहं 40 रुपये से लेकर 105 रुपये तक की लस्सी मिलती हैं। तो गंगा जी में स्नान कीजिए और उसके बाद लुत्फ उठाइए बनारस की मशहूर लस्सी का।

बनारस के अस्सी घाट

अस्सी घाट प्राचीन नगरी कशी का एक पवित्र घाट है। यह गंगा के बांये तट पर उत्तर से दक्षिण घाटों की श्रृंखला में सबसे दक्षिण और अंतिम घाट है इस  जगह का नामांकरण अस्सी नामक प्राचीन नदी के गंगा के साथ संगम के स्थल होने के कारण पड़ा।

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यूँ तो बनारस में करीब 100 घाट हैं परन्तु गंगा किनारे बसा अस्सी घाट खुद में सबसे अनोखा है जिसे देखने के लिये लोग दूर दूर से आते हैं। अगर  गंगा की धार के साथ साथ चलें तो अस्सी घाट पहला ऐसा घाट है जहाँ माँ गंगा के पावन कदम सबसे पहले पड़ते हैं ये वो जगह है जहाँ गंगा और अस्सी नदी का अद्भुद संगम मिलता है। इस घाट की सीढ़ियों पर बैठकर गंगा की खूबसूरती को निहारने में जितना सुकून मिलता है शायद हीं वो सुकून किसी और काम में मिले लेकिन सबसे दिलचस्प ये है कि गंगा कि खूबसूरती को निहारते निहारते कब मिनट घंटो में तब्दील हो जाता है पता हीं नहीं चलता सुबह 4 बजे से हीं यहाँ लोगों का जमघट लगना शुरू हो जाता है क्यूंकि गंगा के किनारे बैठकर सूरज को उगता देख और आसमान में फैलती लालिमा को देखने की ललक हर किसी के मन में होती है। इस खूबसूरत पल को देखते हुए मन में बीएस यही बात आती है कि ” कभी कभी मुझे ये लगता है कि तुम पावन गंगा सी मुझमे बह रही हो और मैं  बैठा  अस्सी घाट सा तुम्हें छू रहा हूँ” तो अगर आपको भी अगर अस्सी घाट कि सीढ़ियों पर बैठकर बहती गंगा की खूबसूरती को निहारना है तो चले आइये अस्सी घाट। इस अस्सी घाट से जुडी पौराणिक कथाएं और मान्यताएं हैं कहते  हैं कि तुलसी दास जी ने इसी घाट पर रहकर रामचरित मानस की रचना की।

वहीं देवी दुर्गा ने शुम्भ -निशुम्भ का वध जिस तलवार से किया । वो तलवार जहाँ गिरी वहीं से अस्सी नदी की शुरुआत हुई। जो की आज अस्सी घाट को छूकर गुज़रती है। अस्सी घाट पर पहुँचते हीं जहाँ घंट घड़ियालों की गूंज सुनाई देती है । वहीं भरी तादात में लोग मुंडन ,पूजा – अर्चना और मांगलिक कार्य करते नज़र आते हैं ।

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