Vishwanath Temple समूचे संसार का मालिक शिव भगवान का मंदिर कहते हैं अगर आप Kashiआये और Vishwanath Temple नहीं आये तो आपकी यात्रा अधूरी रह जाती है । विश्वप्रसिद्ध Kashi विश्वनाथ मंदिर गंगा नदी के तट पर विधमान हैं ऐतिहासिक दृष्टि से काशी  संसार की सबसे प्राचीन नगरी है और वेदों में कई जगह इसका उल्लेख है ऐसी मान्यता है कि ये नगरी शिवजी के त्रिशूल पर बसी है और प्रलय में जब पूरी सृष्टि बह जाएगी तो काशी  को शिवजी बचा लेंगे। भारत में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हैं जिनमे से एक कशी के विश्वनाथ मंदिर है। जैसे :- सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है ,मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है , महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग  मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है , ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है , केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में स्थित है , भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है , काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है , त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है , वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग  झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक स्थान में है , नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में है , रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में है , घृष्णेश्वर मन्दिर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के संभाजीनगर के समीप दौलताबाद के पास है ।

इन बारह ज्योतिर्लिंगों का पाठ सुबह शाम करने से 7  जन्मों के पाप धूल जाते हैं। कहते हैं देश के सभी तीर्थस्थल और धाम अपनी पूर्ण रूप में कशी में हीं समाये हुए हैं ।

Kashi vishwanath temple

काशी में विश्वनाथ मंदिर कैसे पहुंचें

काशी  विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग तक पहुँचने के लिए उत्तरप्रदेश में स्थित काशी  मतलब बनारस शहर पहुंचना होता है यहाँ तक आप रेल मार्ग सड़क मार्ग और वायुमार्ग तीनो से आसानी से पहुँच सकते हैं। वाराणसी और मुगलसराय रेलवे  स्टेशन तक देश के अलग अलग शेहरून से लगभग रोज़ ट्रेनें निकलती रहती है। ट्रैन के अलावा श्रद्धालु बनारस तक सड़कमार्ग से अपने निजी वाहन , बसों और टैक्सी के माध्यम से भी पहुँच सकते हैं। बनारस का सबसे निकटतम हवाई अड्डा लालबहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट है जो बनारस शहर से 26km की दूरी पर बाबतपुर में स्थित है।

काशी में विश्वनाथ मंदिर में कहाँ रुकें

बनारस में काफी संख्या में होटल और धर्मशालाएं बनी हुई हैं जिनमे यात्री अपने बजट के अनुसार कमरा किराये पर ले कर रात में रुक सकते हैं। यहाँ आपको 2500rs से 5000rs तक के हर प्रकार के कमरे मिल सकते हैं और अस्सी घाट के पास आपको 300rs तक का कमरा मिल जायेगा। गंगा घाट के पास कम से कम आपको 1000rs  का कमरा मिलेगा। काशी विश्वनाथ के पास हीं काशी  अन्नपूर्णा अन्नक्षेत्र ट्रस्ट भी बना हुआ  है जहाँ निःशुल्क खाने और रुकने की व्यवस्था है। यहाँ के होटलों और रेस्टोरेंट्स में हर प्रकार के भारतीय व्यंजन मिल जायेंगे।

काशी में विश्वनाथ मंदिर कब पहुंचें

काशी  विश्वनाथ वैसे तो पूरे साल जाया जा सकता है लेकिन वहां जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च महीने का है। पूरे सावन के महीने में और प्रत्येक सोमवार को यहाँ काफी संख्या में देश विदेश से श्रद्धालु आते हैं भीड़ भाड़ से दूर रहने वाले श्रद्धालु इस समय आने से बचें।

काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में रोचक कहानियां

कहते हैं कि ,,,,जब पारवती और शिवजी का विवाह हुआ तो उन्होंने हिमालय छोड़कर किसी सिद्ध क्षेत्र में रहने फैसला किया समूचे पृथ्वी को निहारकर उन्होंने काशी  को चुना लेकिन तब वहां सम्राट दिवोदास का राज था।   शिवजी ने निकुम्भ को आदेश दिया कि वाराणसी को निर्जन करो और निकुम्भ ने वैसा हीं किया शिव और पारवती काशी  आकर बस गए। अब सम्राट देवोदास अपना राजपाठ छीन जाने के वजह से दुखी हो गए। उन्होंने तपश्या कर ब्रह्माजी से वरदान माँगा कि देवता अपने देवलोक में रहें  , नाग पाताल में रहे और पृथ्वी पर केवल मनुष्य हीं रहें और ब्रह्माजी ने कहा तथास्तु नतीजा ये हुआ कि शिवजी और सभी देवताओं को काशी  छोड़कर वापस जाना पड़ा इससे शिवजी बहुत ज्यादा उदास हो गए हिमालय में शिव का मन नहीं लगा उन्होंने राजा को हटाने के लिए 64 योगिनियां भेजीं राजा ने उन्हें काशी  के घाट पर हीं स्थापित कर दिया फिर शंकरजी ने सूर्य को भेजा किन्तु वो यहाँ का वैभव देखकर अपने 12 रूपों में यहीं  बस गए। शंकरजी कि प्रेरणा से ब्रह्माजी पधारे उन्होंने दिवोदास कि सहायता से यहाँ पर 10 अश्वमेधयज्ञ किये और स्वयं भी यहीं बस गए अंत में शंकरजी की इक्षा को पूर्ण करने के लिए भगवान विष्णु यहाँ ब्राह्मण के रूप में पधारे उन्होंने देवोदास को ज्ञानोपदेश दिए तब देवोदास ने शंकर के धाम जाकर उन्हें  आमंत्रण दिया और फिर रूठे हुए शंकर भगवान काशी  आकर वापस स्थित हो गए।

kashi

कहा जाता है कि एक बार भगवान शंकर जी ने ब्रह्माजी का पांचवा सर काट दिया और वह उनके हाथ पर चिपक गया 12  साल तक वह तीर्थ यात्रा करते रहे पर काशी  में आने पर हीं वे पाप मुक्त हो सकें और ब्रम्ह पाप का पाप भी धूल गया ।

ऐतिहासिक दृष्टि से काशी  संसार कि सबसे प्राचीन नगरी है और वेदों में कई जगह इसका उल्लेख है।  काशी  में पितृपक्ष में पिंड प्रदान के लिए कई श्रद्धालु आते हैं पिंडदान और गंगा स्नान का पुण्य पित्रों को भी प्राप्त होता है ऐसा माना जाता है कि पिंड के हर तिल के दाने से पित्रों को हज़ार साल स्वर्ग में स्थान मिलता है।

मणिकर्णिका घाट पर पित्रों की शांति के लिए पिंड दान किया जाता है।  मणिकर्णिका संसार का सबसे पुराना तीर्थ और जलाशय माना जाता है विष्णु जी ने यहाँ 7  साल तक तपश्या की थी। मणिकर्णिका घाट पर तारकेश्वर मंदिर बना हुआ है। कहते हैं यहाँ देह त्यागने पर  देह त्यागने वाले प्राणी को शंकर भगवान तारक मंत्र सुनाते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

स्वर्ग की प्राप्ति के लिए गाय दान जरुरी है और यहाँ कशी की घाट पर गाय की पुंछ पकड़कर गौदान किया जाता है। 

एक बार ब्रह्मा और विष्णु में बहस छिड़ी की दोनों में कौन बड़ा है तभी एक विशाल  अग्निशीला धरती को चीरती हुई प्रकट हुई जिसका कोई आदि था ना हीं कोई अंत और तभी गरूर पर सवार ब्रह्मा जी उसका ऊपरी छोर ढूंढने निकले और विष्णु जी पृथ्वी के अंदर ढूंढने निकले हज़ारों सालों तक ढूंढते रहे पर उन्हें इस ज्योति  का कोई अंत नहीं दिखाई दिया जब दोनों वापस आये तो उन्हें शिवजी का रूप उसी ज्योतिर्लिंग  में दिखाई दिया और वही ज्योतिर्लिंग यहाँ विश्वनाथ मंदिर में प्रकट हुआ था

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *